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शनिवार, 23 जून 2012

अनकही बातें 

कभी सपनों की बातें भी,
अनकही सी रह जाती है ...........!
और कभी युगों की वेदना,
उफनती,
पतझर सी झर जाती है।
किसलय सी अनुभूति,
सप्त-स्वरी वीणा पर,
इन्द्रधनुष सी थिरकती है।
फिर कभी,
जीवन जग मंच पर,
कुशल अभिनेत्री सी,
द्रोपदी आशाएं,
चीरहरण करवाती हैं।
अनबूझी, अनसमझी पहेली सी बातें भी,
अनुभूति क्रम में ................
............अनकही सी रह जाती है।            
     

शनिवार, 16 जून 2012

अतीत 

कालिन्दी के पुलिन पर,
विश्रम्भ जमे आंशुओं का, 
शरद कौमिदी में,
हँसता,
कभी सिसकता,
संगमरमरी ताजमहल !
कब ढहेगा,
वर्तमान,
कब अतीत बनेगा,
क्योंकि,
इतिहासकारों की स्मृति को,
कहानीकारों को,
और,
मुझे भी,
अतीत ही प्रिय है।