अनकही बातें
कभी सपनों की बातें भी,अनकही सी रह जाती है ...........!
और कभी युगों की वेदना,
उफनती,
पतझर सी झर जाती है।
किसलय सी अनुभूति,
सप्त-स्वरी वीणा पर,
इन्द्रधनुष सी थिरकती है।
फिर कभी,
जीवन जग मंच पर,
कुशल अभिनेत्री सी,
द्रोपदी आशाएं,
चीरहरण करवाती हैं।
अनबूझी, अनसमझी पहेली सी बातें भी,
अनुभूति क्रम में ................
............अनकही सी रह जाती है।